अहसान कुछ इस तरह जता कर चले गए....
कुछ लोग मुझे दर-ए-रकीब का बता कर चले गए..........
रहती नही है देर तक चिरागों से रौशनी.......
जो दिल कि ही आतिश वह जला कर चले गए.........
फैला फैला सा है आशना मेरा........
कुछ लोग तसव्वुर में जो आ कर चले गए.........
तस्फियाह तलब है मेरे होने के निशाँ......
तसादुफ़ में दर पै आप के आ कर चले गए.......
दीदा-ए-तर नही है मेरी बंज़र है निगाह........
अश्कोएँ से गिला क्या ....जो देहलीज पर आकर चले गए....
अहसान कुछ इस तरह जता कर चले गए....
कुछ लोग मुझे दर-ए-रकीब का बता कर चले गए....
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