Saturday, December 15, 2007

kaabil

काबिल-ए-ऐतराज़ है मयकदे कि आफियत...होश में आने का बहाना दुरुस्त है....
क्यों बाट रहे हैं मुझे ज़न्नत का वह मंज़र....क्या मुझको पिलाने का इरादा दुरुस्त है....
.राहोएं में कत्ल-ए-आम है बहता लहू नही....हर दौर में आता हु...पुराना उसूल है.....
...आया है दर पै लॉट के...कागज़ का पुलिंदा....क्या सोच रहा है ज़माना दुरुस्त है......

No comments: