....दबी दबी सी हसी...चेहरे पर शरारत क्यों है....
.....लब्जो की खामोशियोएँ में ..इतनी हिफांज़्त क्यों है....
.....हर सांस मोहोब्बत है....तोएं फिर यह इबादत क्यों है....
...ऐ खुदा कातिल को मेरे ...हँसने की इजाज़त क्यों है.....
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