Tuesday, December 29, 2009

...zarrey

वक़्त के टूटे ज़र्रो से...में शीशे का जहा लाया हूँ ....
अश्को से गीली रेत पर ...कदमो के निशाँ लाया हूँ ...
याद नहीं जेब में ....कुछ पुर्जा सा बाकी है......
दीदे लाल है मेरे ....बंज़र है जुबां.......
क्या खूब थे वोह मयखाना लुटाने वाले ......कातिल के दीवाने ....वोह
महफ़िल को सजाने वाले .....  अपने बुढ़ापे में फिर लौट के घर आया हु.....
....अक्स कुछ अजीब है.....दर पर मेरे महबूब के.........
......फिर मौसम बदल गया ...चौखट पर उनको देख कर ........

वक़्त के टूटे ज़र्रो से...में शीशे का जहा लाया हूँ ....
अश्को से गीली रेत पर ...कदमो के निशाँ लाया हूँ ......




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