Thursday, January 14, 2010

shabnam

...सेहर की धुप में ....मैंने जिसको खिलते देखा.....
....वक़्त के हाथो से ....आँचल को फिसलते देखा.....
...कुछ खुद से  कुछ ज़माने से सहमी है ...मोहोब्बत......
...तुझे गौर से देखा तो ज़िन्दगी...फिर मैंने कब आइना देखा.....
..गम मेरा ही कम नहीं.....जो दर्द का दरिया देखा.....
....दौलत की गहरी खायी मैं ...शबनम को लिपटते देखा.....
....जिंदा लोगो की भीड़ मैं ...मुर्दों का काफिला देखा .......

........ऐ खुदा तेरी कायनात मैं......क्या देखा क्या नहीं देखा.......
.....ज़िन्दगी की नीलामी मैं मेरी....लोगो ने फायदा देखा........

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