मचल उठी है तम्मानाएं फिर जागी है ख्वाहिशे...
फिर होगी रूह-ए-तक्थ पर वोही दौर-ए-आज्मयिशेय...
भटकते रहे उम्र भर हमसफ़र कि आस में....
बोलते रहे कुछ हम खुद ही से कुछ विरान रास्ते....
कदम चलते-चलते रूक से गए आहट पे यार कि....
बिखर बिखर के फिर चल दिए अनजान रास्ते.....
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment