Tuesday, December 11, 2007

my poem

हक ए रंजिश का भी रहने ना दिया मुझसे रंजिश करे कोई इद्स काबिल मुझे रहने ना दिया कुछ देर तोएं तनहा था मगर तेरी यादोएँ ने मुझे रहने ना दिया मयकदे तक जाते है हम और लॉट आते है तेरी मदभरी आन्खोए ने हमें मय के काबिल भी रहने न दिया लोग कहते मुझे दीवाना पर डर्र ए रुसवाई का तेरे दीवाना भी हमें कहने ना दिया........

No comments: