रात कि कालि चादर से ...उजाला नंगे पाँव धीरे से आता है....
...सहमें दिलोएँ कि धड्कनोएँ से ...होसला उभर ही जाता है...
....बेदर्द ज़माने कि ठोक्रोएं में...इंसान शीशो का ख्वाब बनता है... .
..लाख तपिश हो ..पर वह ख्वाब सांचे में ढल ही जाता है....
....मुश्किलोएँ से घबरा कर भी....चलने वाला तूफ़ान पार कर ही जाता है...
...दर्द के बजारोएँ से...कारवां गुज़र ही जाता है....
....सुकून तोएं बहुत है मयखाने में...पर संभलने वाला..संभल ही जाता है.... ..सहमें दिलोएँ कि धड्कनोएँ से ...होसला उभर ही जाता है......
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