अस्फार सा रहता है रंग-ए-फ़ेज़ा का अशद-ए-बहार में....
जाने किस असरार को छुपाये रहती है हर घडी.....
सुर्ख आन्खोएँ के पानी से गाफिल है समंदर.....
इसबात नही असलान किस-किस के इशरत-ए-रफ्ता से लबालब है समंदर .........
वीरानी के भी आलम में रह दर्द का अंसार....
लोग कहतें है कि मिट गया वुजूद-ए-साजिद का ऐ-साकी...
बंद है होठ तोएं क्या मयखाने में अभी व्ख्त-ए-सुरूर का है बाक़ी..............
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