अरमानोय के बाज़ार सजा देता हुं....में अपने हर गम को सजा देता हुं.....
...जिंदा रहतें थें कई ख्वाब ..इशारे से तेरे...आन्खोएँ को वोही ख्वाब दिला देता हुं.....
....कहने को जो अपना आशना था ..कभी..में उद्सकी हर दिवार गिरा देता हुं....
.....सोयें है जो ज़ज्बात ...उठा देता ह...में फिर से दुश्मन को पनाह देता हुं....
...एक बार दोबारा कर के यकीन...में अपने ज़ख्मोएँ को हवा देता हुं........
समय के टूटे ज़र्रोएँ से में...कायनात बना देता हुं.........
अरमानोय के बाज़ार सजा देता ह....में अपने हर गम को सजा देता हुं.....
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