कतरा-कतरा लहू का आफताब-ए-आग्होश पै रख दीया ग़ालिब....
आहिस्तह-आहिस्तह महक रहा है साँसों में तेरे उढ़ता हुआ लहू....
वह जो बिखर गयी है चेहरे पे तेरे तबस्सुम-ए-चांदनी....
हुआ है रोशन कोई चिराग कब्र पे मेरी गुजारिश-पे-यार की.........
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment