Tuesday, December 11, 2007

guzarish

कतरा-कतरा लहू का आफताब-ए-आग्होश पै रख दीया ग़ालिब....
आहिस्तह-आहिस्तह महक रहा है साँसों में तेरे उढ़ता हुआ लहू....
वह जो बिखर गयी है चेहरे पे तेरे तबस्सुम-ए-चांदनी....
हुआ है रोशन कोई चिराग कब्र पे मेरी गुजारिश-पे-यार की.........

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