रहता हू घर में रेत के खाता नही खौफ लहरों से....
शब-ए-क़यामत में भी तलाश-ए-जूनून कि करता ह दर-बदर....
ठहरे ही दरिया में जब उभर आती है चांदनी....
सर्द हवओएँ में फिर जग जाती है कशिश-ए-यार कि....
गुमनाम से चेहरे को दिया वक़्त ने हुनर-ए-क़त्ल का....
घिरा रहता ह क़तिलोएँ से और रंजिश का सबब पूछता ह.......
में अपने मुक़द्दर से घबरा के तुझे ढूँढता ह....
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