Tuesday, December 11, 2007

नींद मांगी थी तस्सवुर कि तनहा रातोएँ में
चेहरा -ए- यार तेरा जेहन कि परछाई में रह
ठहरे हुए पानी से समुन्दर कि गिला कौन
गर पूछ ले प्यासों से कि उनको भला कौन
यूं तोएं "फनकार" नही में साथी
पर मेरी इल्म का दर्द तेरी आंखो में भी भर आएगा
तू भी तन्हाई में कभी यह नज्म गुन्गुनायेगा.

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